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संसृति…

There are times, when you hear a news on channels and the poet inside you starts groaning…Tears spontaneously roll down your cheeks, caressing every expression that they encounter on their way down to some undiscovered-unchartered corner of your heart…And something inside you gets unfolded, scattering itself on the paper with ink…

” ममता की स्त्रोतस्विनी- लिए मगर नयनों में पानी|

युग-युग से चलती आयी- नारी तेरी यही कहानी।।

अंग-अंग में रक्ताभ ज़ख्म- माथे पर सिन्दूर सुहाग।

वाणी के मधुर लावण्य में जैसे घुला क्रंदन का राग ।।

दाग लगा मैला आँचल और सिर पर घूंघट धानी।

युग-युग से चलती आयी- नारी तेरी यही कहानी…

ईश्वर के सृष्टि-सामर्थ्य की तू जीवंत एक गवाही।

कवियों की सूखी कलमों की अमृत-भरी सियाही।।

सुंदरता की प्रतिमूर्ति- जिसकी सारी दुनिया दीवानी।

युग-युग से चलती आयी- नारी तेरी यही कहानी…

कभी खिलौना समझ खेल लिया- मन भरा फ़ेंक दिया।

वासना के अंगारों में निर्दयता से आनन् सेंक लिया।।

प्रेम के पवित्र पन्नों पर व्यभिचारों की अमिट निशानी।

युग-युग से चलती आयी- नारी तेरी यही कहानी…

जीवन के कोरे पृष्ठों पर नयी अल्पना बनानी होगी।

सो गयी है जो युगों से दबकर वो चेतना जगानी होगी।।

धरती पर जीवन को जन्म देती है तू माँ-भवानी।

युग-युग से चलती आयी- नारी तेरी यही कहानी…

सृष्टि के कल्पांत का प्रारब्ध है इन आँखों का पानी।

जिसके सिंचन से प्रस्फुटित होगा धरा पर वृक्ष आसमानी।।

उसकी शाखों पे फिर झूलेगी निर्मल सावन की अमर जवानी।

ख़ुद तुझे बदलनी होगी अब – नारी तेरी ये कहानी…”

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That day, he ordered “the same coffee” at “the same restaurant”…Same copy of the “Fault in Our Stars” was in his hand and he was listening to the same old song, “Everything I Do”

The difference was just of the “year” which changed...”A person by his side”, who wasn’t there anymore…And “the smile” on his face, which had been replaced by the wrinkles of seriousness…

” ख़ुद की आँखों का नीर पोंछकर ख़ुद ही मुस्काना पड़ता है।

तू नहीं आ सकेगी मिलने दिल को ये समझाना पड़ता है।।

पलकों को होठों से छूकर तू ख़्वाबों की सौगात दे गयी।

लेकिन अब हर रात नींद को हाथ-जोड़ मनाना पड़ता है।।

कल तलक़ हर सुबह एक नयी-सी उम्मीद जगा करती थी।

क्यों ज़िंदा हूँ अब ख़ुद से ये ख़ुद को बतलाना पड़ता है।।

उमड़ आते हैं कुछ आँसू और ये खुशियाँ ग़म बन जाती हैं।

जब निर्लज्ज दर्द के आगे सिर हर रोज़ झुकाना पड़ता है।।

लोग देखते हैं एक झलक- फिर नज़रें फेर लिया करते हैं।

कुछ कहते हैं- मैं सुनता हूँ, बस इतना-सा ज़ुर्माना पड़ता है।।

नज़रों में तेरा चेहरा खिलखिलाता-सा दिखता है ‘इशिता’।

तेरी ख़ुशियों की ख़ातिर सारा ग़म पी जाना पड़ता है।। ”

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